ग्राम बरवेट में चल रही सप्त दिवस श्रीमद् भागवत कथा का मारुती यज्ञ के साथ हुआ विश्राम…

सारंगी@संजय उपाध्याय
श्री संकट मोचन खेड़ापति हनुमान सरकार के पावन सानिध्य में चल रही भागवत सप्ताह के अंतिम दिवस कथा व्यास श्री सुगुणा बाईसा ने कहा कि श्रीमदभागवत कथा कथा वास्तव में भक्त को भगवान से मिलना का माध्यम है। यह कथा मन को निर्मल कर अज्ञान को दूर करती है, जिससे हृदय में भक्ति जागृत होती है। सात दिनों की यह कथा न केवल मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास लाती है, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़कर निष्काम प्रेम का मार्ग भी दिखाती है।
सुगना बाईसा ने कहा की भागवत कथा श्रमण करने से के आध्यात्मिक लाभ होता है। आत्मिक शुद्धि मिलती है। भागवत कथा नियमित रूप से सुनने से मन के विकार दूर होते हैं और मन पवित्र होता है। भागवत कथा ज्ञान व भक्ति का समन्वय है, यह कथा जीवन में सच्चाई, करुणा और धैर्य सिखाती है।
भागवत कथा श्रमण करने से मोक्ष प्राप्त होता है। जेसे राजा परीक्षित ने भागवत कथा श्रमण कर मोक्ष प्राप्त किया उसी तरह यह कथा भक्तों को मृत्यु के भय से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
भागवत कथा के माध्यम से ही जीव अपनी आध्यात्मिक चेतना को जगाकर भगवान की शरण में जाता है।
*नई बहु को घर के माहोल में ढलने का समय दे।*
भागवत कथा व्यास ने सास बहू के झगड़ो होना आम बात हो गई है। जिससे मां बाप अपने बेटे बहु से अलग रहने लगी है। साध्वी ने कहा कि नयी बहू को नए घर के माहौल और रिश्तों में ढलने के लिए पर्याप्त समय देना अत्यंत आवश्यक है। 20-22 साल की युवती से 50 साल के अनुभव जैसी समझदारी की उम्मीद न करें, बल्कि धैर्य और समझदारी से उनके साथ रिश्ते बनाएं। रिश्ता दबाव से नहीं, प्यार और सम्मान से चलता है, इसलिए उन्हें अपनापन महसूस कराएं।
उन्होंने कहा की नई बहु आई है तो उसे समझने और अपनापन दे। धैर्य रखें नई जगह पर हर कोई जल्द नहीं ढल पाता। बहु को अपने हिसाब से घर के तौर-तरीकों को समझने का समय दें। उस पर तुरंत घर के सभी कामों की जिम्मेदारी या उम्मीदों का बोझ न डालें।
बहु से खुलकर बात करें, उनकी पसंद-नापसंद को समझें और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दें। बहू को ‘पराया’ ना महसूस होने दे बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा मानकर सम्मान दें। क्योंकि एक नया रिश्ता प्यार और भरोसे से पनपता है। जब आप उन्हें समझने की कोशिश करेंगे, तो वे भी घर में घुल-मिल जाएंगी।
भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वक्ता सुगुणा बाईसा ने भगवान श्रीकृष्ण- सुदामा मिलन प्रसंग का सुमधुर वर्णन किया। उन्होंने कहा कि सुदामा जी भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र और भक्त थे। वह समस्त वेद पुरानों के ज्ञाता और विद्वान गरीब ब्राह्मण थे, लेकिन सुदामा ने कभी अपने मित्र द्वारकाधीश को कभी अपनी गरीबी का एहसास नहीं होने दिया। सुदामा की गरीबी देखकर भगवान के आंखों में आंसू आ गए। सुदामा कुछ दिन द्वारिकापुरी में रहे, लेकिन संकोच बस कुछ मांग नहीं सके, जब भगवान श्रीकृष्ण सुदामा को द्वारिकापुरी से विदा करते कुछ दूर तक छोड़ने आए और उनसे गले लगे, तब सुदामा सोचने लगे की घर में पत्नी पूछेगी कि अपने मित्र से क्या लाये हो? वह क्या जवाब देंगे? यही सोच कर घर की ओर जा रहे थे और जब सुदामा घर पहुंचे तो वहां उन्हें अपनी झोपड़ी नजर नहीं आई, सुदामा की पत्नी सुशीला ने सुदामा से कहा देखा कृष्ण ने हमारी सारे दुख हर लिये। सुदामा को कृष्ण की मित्र प्रेम याद आया उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गये। साध्वी ने कहा कि कृष्ण एवं सुदामा की यही सच्ची मित्रता थी। उन्होंने कहा आज इस संसार में कृष्णा सुदामा का मित्रता का मिसाल है। साध्वी ने 7 दिनों के दौरान भगवान के विभिन्न लीलाओं का भी वर्णन किया।
भागवत कथा के अंतिम दिवस महाआरती के लाभार्थी रतनलाल पाटीदार परिवार ने लिया। इसके बाद प्रसादी में भंडारा भोज का आयोजन किया गया। इससे पहले मंदिर प्रांगण में यज्ञ का आयोजन भी हुआ जिसमे मुख्य यजमान बाबूलाल पांचाल, मांगीलाल पाटीदार, पन्नालाल पाटीदार, लालचंद पाटीदार, राधेश्याम पाटीदार परिवार ने लिया। इससे पहले कथा व्यास देवकन्या साध्वी श्री सुगुणा बाईसा का सम्मान आयोजन समिति के सदस्य रतनलाल पाटीदार, पूनमचंद पाटीदार, बाबूलाल पाटीदार, अशोक त्रिवेदी, सतीश पाटीदार, निलेश पाटीदार, पारस पाटीदार, बबलू पाटीदार जगदीश प्रजापत ने प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।
भागवत कथा के दौरान एक मार्मिक प्रसंग सुनते हुए साध्वी ने कहा की माता-पिता के भगवान के घर चले जाने के बाद बहन के लिए घर के दरवाजे कभी बंद नही करना चाहिए। क्योंकि मां-बाप के बाद बहन को भाई से ही सबसे ज्यादा उम्मीद होती है, और उनका प्रेम व अपनापन भाई के लिए एक संजीवनी की तरह होता है। मां बाप के चले जनेवके बाद बहन को ऐसा लगता है की अब मेरे मायके के दरवाजे हमेशा ले लिए बंद हो जायेगे। ऐसा सोचकर मन व्याकुल करती है। लेकिन आप लोग अपनी बहन के लिए दरवाज़े खुले रखना क्योंकि मां-बाप के बाद भाई का एक फोन या मुलाकात बहन के अकेलेपन को दूर करती है और उसे ताकत देती है। इस मार्मिक प्रसंग पर पांडाल में बैठी महिलाओ के आखों से अश्रुधारा बहने लगी।
भाई बहन का संबंध भावना से बंधा होता है। जब घर के दरवाजे बंद होते हैं, तो उससे पहले दिल के दरवाजे बंद हो जाते हैं, इसलिए खून के रिश्ते में प्रेम हमेशा कायम रखना चाहिए। ताकि भाई बहन का प्रेम बना रहे। भाई-बहन का रिश्ता निस्वार्थ प्यार और विश्वास पर टिका होता है, जहां बहन को मायके में हमेशा अपनापन मिलना चाहिए। इसीलिए माता-पिता के जाने के बाद भाई को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बहन को सुरक्षा और सहयोग देना चाहिए। बहन को यह महसूस न होने दें कि वह पराई हो गई है।




