सारंगी

संघर्ष से सफलता तक: सारंगी की अर्चिता बहुगुणा ने नाना-नानी का सपना किया साकार, उत्कृष्ट प्रदर्शन पर मिली स्कूटी…..

सारंगी@संजय उपाध्याय 

मेहनत, संघर्ष और दृढ़ संकल्प के बल पर हर मुश्किल को पार किया जा सकता है। सारंगी की होनहार छात्रा अर्चिता बहुगुणा ने अपनी सफलता से यह साबित कर दिखाया है। कक्षा 12वीं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली अर्चिता को राज्य सरकार द्वारा प्रोत्साहन स्वरूप स्कूटी प्रदान की गई है। उसकी इस उपलब्धि से पूरे क्षेत्र में खुशी का माहौल है।

अर्चिता का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जब वह मात्र एक वर्ष की थी, तभी उसकी माता का देहांत हो गया। मां के निधन के बाद उसके नाना गिरधारी लाल चौहान और नानी कमला बाई चौहान उसे अपने साथ सारंगी ले आए और उसका पालन-पोषण अपनी बेटी की तरह किया। मजदूरी कर परिवार के साथ जीवन व्यतीत करने वाले इस दंपति ने जीवनभर कठिन परिश्रम कर अपनी बेटियों और बेटों को भी पढ़ाया-लिखाया और उन्हें आगे बढ़ाया। इसी बीच अर्चिता की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा और स्नेह के साथ निभाया।

आर्थिक अभावों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद गिरधारी लाल चौहान और कमला बाई चौहान ने अर्चिता की शिक्षा में कभी कोई कमी नहीं आने दी। उन्होंने अपनी नातिन को अच्छे संस्कार दिए और पढ़ाई के लिए हमेशा प्रेरित किया। नाना-नानी के त्याग, संघर्ष और अर्चिता की मेहनत का परिणाम यह रहा कि उसने कक्षा 12वीं की परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर सारंगी विद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया।

अर्चिता की इस उपलब्धि पर राज्य सरकार द्वारा उसे स्कूटी प्रदान की गई, जिससे उसकी आगे की पढ़ाई और भी सुगम हो सकेगी। स्कूटी मिलने के बाद अर्चिता ने अपनी सफलता का श्रेय अपने नाना-नानी को देते हुए कहा कि उनके प्रेम, त्याग और विश्वास ने ही उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है।

आज अर्चिता बहुगुणा की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उसके नाना-नानी के वर्षों के संघर्ष, त्याग और शिक्षा के प्रति समर्पण की जीत है। उसके सपने अभी यहीं तक सीमित नहीं हैं। वह आगे उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में बड़ी उपलब्धियां हासिल करना चाहती है।

“मजदूरी कर परिवार संभालने वाले गिरधारी लाल चौहान और कमला बाई चौहान ने अपनी बेटियों के साथ-साथ अपनी नातिन को भी शिक्षित कर यह साबित कर दिया कि सच्चे संस्कार और शिक्षा ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।”

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