झाबुआथांदला

आधुनिक खेती के सपने, लेकिन खेत तक पहुंचने का रास्ता नहीं,,,पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन नहीं बदले रास्ते के हालात,,,आखिर कब बदलेगी ग्रामीण अंचलों की तस्वीर..?..सरकार के दावे और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर….?

#Jhabuahulchul 

झाबुआ@आयुष पाटीदार /जितेंद्र बैरागी 

एक ओर प्रदेश की मोहन सरकार किसानों को आधुनिक खेती अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रही है। नई तकनीक, आधुनिक कृषि यंत्र, ड्रिप सिंचाई और उन्नत बीजों के माध्यम से खेती को लाभ का सौदा बनाने की बातें की जा रही हैं, लेकिन दूसरी ओर झाबुआ जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों की हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। यहां किसान आधुनिक खेती तो करना चाहते हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या खेतों तक पहुंचने के लिए रास्ते की है।

यह मामला झाबुआ जिले के थांदला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत धुमडिया के डामर फलिया का है, जहां ग्रामीण वर्षों से खेतों तक पहुंचने के लिए सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार आवेदन और गुहार लगाने के बावजूद आज तक सड़क नहीं बन पाई है।

खेत तक पहुंचने का रास्ता नहीं, तो आधुनिक खेती कैसे होगी..?

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार खेती को आधुनिक बनाने की बात कर रही है, लेकिन खेतों तक जाने के लिए सड़क ही नहीं है। बारिश के दिनों में हालात और भी बदतर हो जाते हैं। कच्चे रास्ते कीचड़ में तब्दील हो जाते हैं, जिससे ट्रैक्टर, कृषि यंत्र और यहां तक कि किसान खुद भी अपने खेतों तक आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब खेत तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं होगा, तो आधुनिक खेती आखिर कैसे संभव होगी?

मूलभूत सुविधाओं की कमी से टूट रहे किसानों के सपने

किसानों का कहना है कि वे नई तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी उनके सपनों पर पानी फेर रही है। कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने सड़क निर्माण की मांग रखी गई, लेकिन आज तक समस्या जस की तस बनी हुई है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, किसानों की तरक्की के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

पहले सड़क बने, तभी सफल होगी आधुनिक खेती

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार यदि वास्तव में किसानों को आधुनिक बनाना चाहती है, तो सबसे पहले खेतों तक पहुंचने के लिए पक्के रास्तों की व्यवस्था करनी होगी। क्योंकि आधुनिक मशीनें, उन्नत तकनीक और सरकारी योजनाएं तभी सफल होंगी, जब किसान बिना परेशानी अपने खेत तक पहुंच सके।

छह पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन सड़क का सपना आज भी अधूरा

ग्रामीणों का दर्द यह है कि खेतों तक सड़क बनाने की मांग करते-करते उनकी छह पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन आज तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। वर्षों से आवेदन दिए जा रहे हैं, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटाए जा रहे हैं, लेकिन हालात आज भी वैसे ही बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हर चुनाव में सड़क बनाने के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे भी हवा हो जाते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चों पर भी पड़ रहा असर

इतना ही नहीं, स्कूल जाने वाले बच्चों को भी इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार बच्चे कीचड़ और फिसलन भरे रास्तों से गिरते-पड़ते स्कूल पहुंचते हैं। अब जबकि बारिश का मौसम सिर पर है, ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। बरसात शुरू होते ही रास्ते कीचड़ में बदल जाएंगे और खेतों तक पहुंचना तो दूर, बच्चों का स्कूल जाना भी मुश्किल हो जाएगा।

जिम्मेदार कब सुनेंगे ग्रामीणों की आवाज..?

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल मंचों से आधुनिक खेती की बातें करने से किसानों की तस्वीर बदलेगी, या फिर सरकार और प्रशासन गांव-गांव जाकर किसानों की मूलभूत समस्याओं का समाधान भी करेगा..? आखिर कब तक किसान आधुनिक खेती के सपने देखते रहेंगे और खेत तक पहुंचने के लिए कीचड़ भरे रास्तों से जूझते रहेंगे..? यह सवाल आज झाबुआ जिले के ग्रामीण अंचलों से उठ रहा है, जिसका जवाब शायद जिम्मेदारों को देना होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!