साइकिल ही जीवन का आधार: 58 साल की उम्र में भी सुखराम डामर का जुनून प्रेरणादायी…

रायपुरिया@राजेश राठौड़
विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर फिटनेस, पर्यावरण संरक्षण और सरल जीवन शैली का संदेश देती एक अनूठी कहानी झाबुआ जिले के लालारुंडी ग्राम से सामने आई है। यहाँ के निवासी 58 वर्षीय सुखराम डामर ने अपनी जीवन शैली से यह साबित कर दिया है कि साइकिल न केवल आवागमन का एक साधन है, बल्कि यह एक स्वस्थ और अनुशासित जीवन जीने का मंत्र भी है। वर्ष 1968 में जन्मे सुखराम डामर ने मात्र 12 वर्ष की आयु में साइकिल चलाना शुरू किया था और आज पांच दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी उनका यह सफर अनवरत जारी है।
सुखराम डामर का दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी साइकिलिंग आज भी उतनी ही जीवंत है। वे प्रतिदिन अपने गांव लालारुंडी से रायपुरिया-पेटलावद मार्ग पर स्थित संपर्क ग्राम संस्था तक साइकिल से जाते हैं। सुबह और शाम का सफर मिलाकर वे प्रतिदिन 16 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। उन्होंने बताया कि जिस दिन से उन्होंने साइकिल को अपने जीवन का साथी बनाया, उन्होंने कभी भी इसे नहीं छोड़ा। आज के दौर में जहाँ हर व्यक्ति नई-नई मोटरसाइकिलों और आधुनिक वाहनों के पीछे भाग रहा है, वहीं सुखराम भाई का शौक आज भी साइकिल चलाना ही है।
सेहत का राज
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अपनी सेहत का राज साझा करते हुए सुखराम डामर कहते हैं कि साइकिल चलाने के अनगिनत फायदे हैं। वे गर्व से बताते हैं कि नियमित साइकिलिंग की बदौलत आज 58 वर्ष की आयु में भी उनके शरीर पर किसी प्रकार का इंजेक्शन नहीं लगा है। उन्होंने कहा कि कभी-कभार सामान्य बुखार आने पर छोटी-मोटी दवाओं से वे स्वस्थ हो जाते हैं। सुखराम के अनुसार, निरंतर साइकिल चलाने से शरीर का संतुलन बना रहता है और रक्त संचार भी बेहतर रहता है। झाबुआ के इस साइकिल प्रेमी का उदाहरण आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ा सबक है, जो प्रदूषण को कम करने और स्वयं को फिट रखने के लिए साइकिल को अपनाने की एक जीवंत मिसाल पेश करता है।



