थांदला

मुंडेरी नहीं, सुरक्षा नहीं…! खुले कुएं ने छीन ली दो मासूमों की सांसें, जिम्मेदार कौन..?

#Jhabuahulchul 

थांदला@आयुष पाटीदार

एक बार फिर खुले और बिना मुंडेरी वाले कुएं ने दो मासूम जिंदगियां लील लीं। मामला ग्राम उदयपुरिया के सिब्बल फलिया में सोमवार शाम एक ही परिवार के दो मासूम भाई-बहन कुएं में डूब गए, जिससे उनकी मौत हो गई। हादसे के बाद गांव में मातम पसरा हुआ है।

जानकारी के अनुसार 5 वर्षीय नंदिनी पिता रघु मईडा और 4 वर्षीय शनिराज पिता रघु मईडा शाम करीब 5 बजे घर से दुकान जाने के लिए निकले थे। काफी देर तक दोनों बच्चे घर नहीं लौटे तो दादा-दादी और ग्रामीणों ने उनकी तलाश शुरू की। खोजबीन के दौरान दोनों बच्चे गांव के एक कुएं में डूबे हुए मिले। बच्चों को बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

बताया जा रहा है कि दोनों बच्चों के माता-पिता मजदूरी के लिए सूरत, गुजरात गए हुए हैं और दोनों मासूम अपने दादा-दादी के साथ गांव में रहते थे। घटना के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है तथा पोस्टमार्टम मंगलवार सुबह कराया जाएगा।

लेकिन इस हादसे के साथ सबसे बड़ा सवाल फिर खड़ा हो गया है। आखिर ग्रामीण क्षेत्रों में खुले और बिना मुंडेरी वाले कुएं कब तक लोगों, खासकर मासूम बच्चों की जान लेते रहेंगे..? 

झाबुआ जिले के कई गांवों में आज भी ऐसे सैकड़ों कुएं हैं जिनके चारों ओर न तो सुरक्षा दीवार है और न ही कोई चेतावनी बोर्ड। लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण खतरा लगातार बना हुआ है।

यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी जिले के अलग-अलग गांवों में कुएं में गिरने और डूबने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार हादसे के बाद संवेदनाएं व्यक्त होती हैं, जांच होती है, लेकिन खुले कुओं की समस्या जस की तस बनी रहती है। 

सवाल यह है कि क्या प्रशासन अब भी नहीं जागेगा..? क्या दो मासूमों की मौत के बाद भी जिले के खुले कुओं की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस अभियान शुरू होगा या फिर किसी और परिवार को अपने बच्चों को खोने का दर्द झेलना पड़ेगा..?

उदयपुरिया के इस हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि लापरवाही और सुरक्षा के अभाव की कीमत सबसे ज्यादा मासूमों को चुकानी पड़ती है। अब जरूरत है कि जिले के सभी खुले कुओं का सर्वे कर उन्हें सुरक्षित किया जाए, ताकि भविष्य में कोई और नंदिनी और शनिराज इस तरह असमय काल के गाल में समाने को मजबूर न हों।

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