फ्रिज और वाटर कूलर का चलन, कुंभकार के सामने रोजगार का संकट….!

आधुनिकता की आंधी में पिछड़े , मिट्टी से बने पारंपरिक पात्रों की बिक्री में गिरावट, कुंभकार के
सामने रोजगार का संकट
#Jhabuahulchul
सारंगी@संजय उपाध्याय
गर्मियों की तपती दोपहर में हर घर की प्यास बुझाने वाले मटके और सुराहीया अब बीते जमाने की चीज बनती जा रही है मिट्टी से बने यह पारंपरिक दशी फ्रिज जो कभी रसोई की शान हुआ करते थे आज इलेक्ट्रॉनिक फ्रीज , वाटर कूलर, मिनरल वाटर की बोतल और आरो सिस्टम के सामने अपनी पहचान खोते जा रहे हैं इसका सबसे गहरा असर उन कुम्हार परिवारों पर पड़ा है जो पीडियो से इस कला में पारंगत रहे हैं और जिनकी रोजी-रोटी इसी परंपरागत कारीगरी पर निर्भर थी क्षेत्र से लगे कुम्हार जगदीश प्रजापत बरवेट , भेरूलाल प्रजापत ने संवाददाता को बताया की एक समय था जब गर्मी शुरू होते ही उनके घर पर खरीदारों की भीड़ लग जाती थी मटका सुराई, कुल्हड़ जैसे उत्पाद हाथों हाथ बिकते थे लेकिन अब परिस्थितियों पूरी तरह बदल चुकी है भैरू भाई बताते हैं अब तो हमें खुद क्षेत्र के या नगर के साप्ताहिक हाट बाजारों में जाकर फुटपाथ पर मटको की दुकान सजानी पड़ती है दिन भर में दो-चार मटके ही बड़े मुश्किल से बिकते हैं डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक आविष्कारों ने हमारी पूरी मेहनत और परंपरा को हाशिए पर ला दिया है
पुस्तैनी व्यवसाय को बचाना होगा : मिट्टी और ईंधन के बढ़ते दाम, मटको की घटती मांग और आधुनिक उपकरणों की लोकप्रियता ने कुमार परिवारों को अपने खानदानी व्यवसाय से विमुख कर दिया है अब युवा इस काम में रुचि नहीं दिखा रहे हैं परिवार के बड़े सदस्य भी मजदूरी छोटा-मोटा काम करने या रोजगार की तलाश में बड़े शहरों में पलायन करने को मजबूर है आज जब हर और पर्यावरण संरक्षण की बात हो रही है ऐसे में मिट्टी से बने मटके,सुराई न सिर्फ एक परंपरा है बल्कि टिकाऊ जीवन शैली का हिस्सा भी है जरूरत है कि इस कला को सिर्फ मेले या प्रदर्शनीयो तक सीमित ना रखा जाए बल्कि इसे आम जीवन में फिर से स्थान मिले तभी कुम्हारों की कला और उनकी आजीविका दोनों को नया जीवन मिल सकेगा
माटी कला को प्रोत्साहित करना जरूरी :
समाजसेवी मांगीलाल प्रजापत ने कहा की मिट्टी से बने यह उत्पादन सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक है ऐसे पारंपरिक शिल्प को बचाने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करना चाहिए मटका, सुराई देशी फ्रिज को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि एक और हमारी सांस्कृतिक धरोहर बची रहे और कुम्हारो की रोजी-रोटी भी चलती रहे सरकार द्वारा कुम्हारों के लिए प्रशिक्षण विपणन सुविधा और सब्सिडी जैसी योजनाएं चलाई जा रही है लेकिन जमीन स्तर पर इनका असर बहुत कम दिखाई देता है यदि इस कला को बचाना है तो स्थानीय स्तर पर बिक्री के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना, स्कूलों और सरकारी संस्थानों में देसी मटको के उपयोग का प्रोत्साहित करना और हस्तशिल्प मेलों में इन उत्पादों को प्रमुखता देना आवश्यक है




