कलेक्टर साहब, एक नज़र इधर भी,,,क्या नीमच की घटना से सबक लेगा झाबुआ जिला प्रशासन…?..स्कूल खुलने से पहले मंडरा रहा खतरा,,सांदीपनि स्कूल की बिल्डिंग पर मधुमक्खियों का विशाल छत्ता, मासूमों की सुरक्षा पर सवाल…!

#Jhabuahulchul
खवासा@आनंदीलाल सिसोदिया/आयुष पाटीदार
शिक्षा के मंदिर में नौनिहालों का भविष्य संवरता है, लेकिन बामनिया मार्ग पर बने नवनिर्मित सांदीपनि स्कूल की तस्वीरों ने रूह कंपा दी है। स्कूल की नई बिल्डिंग पर मधुमक्खियों का एक ऐसा ‘विशालकाय किला’ तैयार हो गया है, जो किसी भी वक्त मासूमों की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। प्रशासन और स्कूल प्रबंधन अभी ‘मौन’ है, जबकि खतरा उनके सिर पर ‘भिनभिना’ रहा है।

हादसे को दावत देता ‘विशाल साम्राज्य’
स्कूल अभी चालू नहीं हुआ है। अभी कुछ ही दिनों में एडमिशन भी चालू हो जाएंगे। प्रशासन के पास आखिरी मौका है। आने वाले चंद दिनों में जैसे ही स्कूल के गेट खुलेंगे, बच्चों की शोर- शराबे वाली टोलियां यहाँ पहुँचेंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि मधुमक्खियों को शोर और हलचल से सख्त चिढ़ होती है। ऐसे में क्या गारंटी है कि स्कूल की पहली घंटी इन मधुमक्खियों को हमले के लिए नहीं उकसाएगी..? यह छत्ता इतना बड़ा हो चुका है कि अगर हमला हुआ, तो बच्चों को भागने का मौका तक नहीं मिलेगा। अगर समय रहते इसको नहीं हटाया गया तो आने वाले दिनों में यह मधुमक्खियों का छत्ता विशाल रूप ले सकता है। ऐसा ही एक ओर छत्ता बिल्डिंग के कौने पर पैर पसार रहा है..!
पिछली चीखें आज भी गूँज रही हैं…
हमें भूलना नहीं चाहिए कि प्रदेश के अन्य जिलों में स्कूलों के भीतर क्या मंजर देखने को मिले थे। पहले भी कई जिलों में जब मधुमक्खियों ने बच्चों पर हमला किया था, तो पूरा स्कूल मैदान ‘मासूमों की चीखों’ से थर्रा उठा था। दर्जनों बच्चे बेहोश होकर अस्पताल के बेड पर पड़े थे। उन हादसों की इकलौती वजह यही थी कि प्रबंधन ने छत्ते को ‘हल्के’ में लिया था। क्या खवासा में भी हम किसी मासूम के अस्पताल पहुँचने या किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहे हैं..?
नीमच जिले में भी हो चुकी घटना..
अगर कंचन बाई ने हिम्मत नहीं दिखाई होती तो न जाने कितने बच्चे मर जाते। मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले के रानपुर गाँव में जिससे बात कीजिए वह यही कहते हुए कंचन बाई की बहादुरी और साहस की कहानी सुना रहा है। दरअसल, ज़िला मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर बसे रानपुर का आंगनबाड़ी परिसर 2 फ़रवरी 2026 सोमवार की दोपहर मधुमक्खियों के हमले की चपेट में आ गया। उसी समय वहाँ मौजूद 55 साल की आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई ने हालात को भांपा और बच्चों को बचाने दौड़ पड़ीं। उनके इस साहसी क़दम ने लगभग 25 बच्चों की जान बचा ली, जिसमें उनका अपना पोता भी शामिल था लेकिन वह ख़ुद मधुमक्खियों के हमले में बुरी तरह घायल हो गई थीं। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
अब खवासा के सांदीपनि स्कूल में बना यह विशाल छत्ता उसी खतरे की ओर इशारा कर रहा है। सवाल यह है कि जब पहले से ऐसी घटनाएं चेतावनी दे चुकी हैं, तो क्या यहां भी उसी गलती को दोहराया जाएगा. ? या फिर प्रशासन समय रहते जागकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा…?




