गांव में सजी संझा बाई – बालिकाओं की तोतली आरती से गूंजा वातावरण…!

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रायपुरिया@राजेश राठौड़
दस दिनों तक गणपति बप्पा की भक्ति और उत्सवमय वातावरण के बाद अब ग्रामीण अंचलों में संझा बाई पर्व की शुरुआत हो चुकी है। यह पर्व 16 श्राद्ध पक्ष में मनाया जाता है और विशेषकर कुंवारी बालिकाओं द्वारा श्रद्धापूर्वक व्रत एवं पूजा की जाती है।
सनातन परंपरा के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में माता पार्वती अपने मायके आती हैं और संझा बाई के रूप में उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस व्रत से बालिकाओं को मनवांछित फल और माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गांव में आज भी कई परिवार इस प्राचीन परंपरा को निभा रहे हैं। रायपुरिया के पुष्पेंद्रसिंह राठौर के घर में उनकी पुत्री युवाक्षी राठौर प्रतिवर्ष 16 दिन तक गोबर से संझा बाई की आकृति बनाकर पूजा करती हैं। आधुनिक दौर में जहां रेडीमेड कागज पर छपी संझा बाई की तस्वीरें दीवारों पर चिपका दी जाती हैं, वहीं युवाक्षी जैसी बालिकाएं पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
इस बार चूंकि पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण का सूतक लगा हुआ था, इसलिए पहले दिन संझा बाई की पूजा नहीं हो सकी। लेकिन दूसरे दिन से बालिकाओं ने गोबर से बीज की आकृति बनाकर पूजा शुरू की। शाम को गांव की छोटी-छोटी लड़कियां एकत्रित होकर संझा बाई की आरती उतारती हैं। उनकी तोतली आवाज और उत्साहपूर्ण गीत पूरे वातावरण को भक्ति से सराबोर कर देते हैं।
बालिकाएं पारंपरिक गीत गाती हुई संझा बाई के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं –
“छोटी सी गाड़ी गुड़कती जाए,
जी मा बैठी संझा बाई संझा बाई…
घाघरो घमकावती जाए, चुनरी चमकवती जाए,
पायल बजावती जाए, बिछिया बजावती जाए…”
संझा बाई पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि यह ग्रामीण समाज में सामूहिकता, संस्कार और परंपरा के संरक्षण का भी प्रतीक है।





