रायपुरिया

विलुप्त होती परंपराएं: सावन के झूले अब यादों में रह गए…!

#Jhabuahulchul 

रायपुरिया@राजेश राठौड़ 

सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को समर्पित है। हरियाली और भक्ति के इस माह का आरंभ हो चुका है, लेकिन इसके साथ जुड़ी कई परंपराएं अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। खासकर वह परंपरा, जो बच्चों से लेकर महिलाओं तक के मन को आनंदित करती थी — सावन के झूले।

एक समय था जब जैसे ही सावन की आहट होती थी, मोहल्लों और गलियों में पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते थे। महिलाएं और बच्चियां सज-धजकर इन झूलों पर झूलती थीं, और सावन के पारंपरिक गीतों की मधुर गूंज गांव की फिजाओं में रस घोल देती थी। यह सिर्फ एक मनोरंजन नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल, भाईचारे और परंपरागत सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हुआ करता था।

परंतु आज हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग इन परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। अब न मोहल्लों में झूले दिखते हैं, न ही शाम के समय झूले के गीतों की धुन सुनाई देती है। सावन की वह पुरानी रौनक अब तस्वीरों और यादों में ही सिमटकर रह गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार झूला झूलना न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभदायक होता है। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं और मानसिक तनाव भी कम होता है। बावजूद इसके, आज की पीढ़ी इन परंपराओं से दूर होती जा रही है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हम आने वाली पीढ़ी को यह परंपराएं सिखा पाएंगे? क्या फिर से गूंजेंगे सावन के झूले और गीत? यह समय है परंपराओं को संजोने और उन्हें फिर से जीवंत करने का — वरना वे पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगी, और हम सिर्फ अफसोस करते रह जाएंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!