सारंगी

शुभ मुहूर्त में नगर में कई जगह हुआ होलिका दहन, महिलाओं ने पूजन कर मांगी नगर में खुशियाली….

#Jhabuahulchul 

सारंगी@संजय उपाध्याय

फागुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन की पूजन से पहले गोबर के बने हुए आभूषण पहनाए जाते हैं
आभूषण का नाम सामने आते ही सोने चांदी या फिर आर्टिफिशियल आभूषण का ध्यान आता है लेकिन नगर एवं ग्रामीण अंचलों में यह पुरानी प्रचलन आज भी कायम है यह आभूषण वृक्ष रुपी होलिका को पहनाए जाते हैं जिसका जन्म होने के बाद इन गोबर के आभूषणों के कुछ हिस्सों को घर पर लाकर वर्ष भर रखा जाता है मान्यता है कि इस घर पर रखने से छोटे बच्चों को नजर से बचाया जा सकता है वही घर में भी सुख समृद्धि बनी रहे

परंपरा के अनुसार नगर सहित अंचलों में होलिका दहन के अवसर पर होलिका का पूजन कर उसे पर गोबर से बने आभूषणों की माला पहने जाने की परंपरा है इसी परंपरा के तहत सोमवार को नगर में होलिका दहन के कुछ दिन पूर्व से अनेक घरों में गाय के गोबर से होलिका के सिंगर के लिए आभूषण तैयार किए जाते हैं जीने भरगुलिया कहा जाता है भरगुरिया बनाने के पीछे मान्यता है कि किसी भी प्रकार की पूजन में गोबर के उपले का विशेष महत्व रहता है गाय के गोबर से निकलने वाला दुआ नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है होलिका दहन में उपले या भारगुलिए बनाए जाते हैं गोबर के छोटे-छोटे गोल बनाकर बीच में छेद कर उनकी माला होलिका को माला पहनाई जाती है गोबर से बने उपले जलने से घर की परेशानियां दूर होती है हानिकारक बैक्टीरिया भी मर जाते हैं वातावरण शुद्ध होता है

होलिका दहन के साथ हीं भरगुलियों का भी दहन होता है जब होलिका की अग्नि शांत होती है तो इन जले हुए भरगुलियों को अंगार के रूप में घर लाया जाता है होलिका की अग्नि धर्म रूपी अग्नि है इसकी अग्नि से लोग घर का चूल्हा भी प्रज्वलित करते हैं वहीं इन जले हुए भरगुलियों को घर में रखने से बच्चों को बुरी नजर से भी बचाया जाता है

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