झाबुआ

पर्युषण महापर्व : संधि साधना और मुक्ति की ओर साध्वी कल्पदर्शिता का संदेश…!

#Jhabuahulchul 

झाबुआ@हरीश यादव 

बावन जिनालय के पौषध भवन में गुरुवार को पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन धर्मसभा का आयोजन हुआ। इस अवसर पर साध्वी कल्पदर्शिता महाराज साहब ने साधना, आत्मकल्याण और मुक्ति मार्ग पर सारगर्भित विचार रखे।

साध्वीश्री ने कहा कि संधि साधना का अर्थ है उचित नक्षत्र के संयोग में की जाने वाली साधना। इस साधना का उद्देश्य महापुरुषों की आत्मा से अपनी आत्मा के माध्यम से संपर्क करना है। जब यह साधना पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक की जाती है, तब यह सफल होती है।

उन्होंने कहा कि गुरु और सत्य दोनों का वास्तविक स्वरूप सामान्य जन के लिए सहज सुलभ नहीं होता। जैन समाज में चाहे स्थानकवासी हों, तेरापंथी, मूर्तिपूजक या दिगंबर—सभी का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति की साधना करना है। अन्य सभी भेदभाव को भूलकर आत्मा का कल्याण और आत्मा से परमात्मा का संबंध स्थापित करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए।

साधना में चूक का उदाहरण

साध्वीश्री ने एक उदाहरण देते हुए समझाया कि एक व्यक्ति अंधेरे कुएं में गिर गया। कुएं के बाहर से उसे बताया गया कि कुएं में एक दरवाजा है, उसे खोजकर खोलो तो सीढ़ियों से बाहर निकल सकते हो। वह व्यक्ति कुएं में बार-बार घूमता रहा, लेकिन दरवाजा ढूंढ नहीं पाया और चक्कर लगाता रहा।

ठीक ऐसी स्थिति हम श्रावक-श्राविकाओं की है। हम मुक्ति के द्वार तक पहुंचते हुए भी चूक जाते हैं। हमें चाहिए कि प्रतिदिन ज्ञान सहित धार्मिक क्रियाएं करके अपने कर्मों का क्षय करें।

पौषध भवन में प्रतिक्रमण और गाथा पाठ

संध्या काल में पौषध भवन में प्रतिक्रमण का आयोजन हुआ। इसमें वरिष्ठ श्रावक ओएल जैन, कमलेश भंडारी, अनिल रुनवाल, संघ अध्यक्ष संजय मेहता के साथ बालक रितिक राठौर, हर्षित, चैत्य प्रकाश मुथा, स्पर्श गौरव रुनवाल, गौतम सचिन पगारिया और दिव्यांश विवेक रुनवाल आदि ने सहभागिता की और गाथाएं बोलीं।

दर्शन वंदन पूजन अभियान

इस अवसर पर समाज में दर्शन वंदन पूजन अभियान भी चलाया गया। इसके तहत अनिल-शोभना जैन, धन्नालाल कटारिया, लीलाबाई भंडारी, रामनारायण जैन और लीलाबाई गोखरू के घरों पर प्रभु की प्रतिमा ले जाकर दर्शन कराए गए।

इन श्रद्धालुओं ने जीवन भर धर्म और समाज सेवा में अग्रणी भूमिका निभाई है, लेकिन अस्वस्थता के कारण मंदिर नहीं जा पा रहे थे।

समाज के युवाओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ प्रभु की प्रतिमा और अष्टप्रकारी पूजन सामग्री उनके घर ले जाकर भक्ति भाव से पूजन और वंदन करवाया, ताकि उन्हें प्रभु के दर्शन का लाभ मिल सके।

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