माता कोशल्या ने राम को जन्म दिया लेकिन मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम केकई ने बनाया,,साध्वी सुगना बाईसा….

नि:स्वार्थ भक्ति, साहस और बलिदान करता है, उसका मोक्ष प्रभु के चरणों में होता है साध्वी सुगूणा बाईसा।श्रीमद्भागवत कथा में हुआ श्रीकृष्ण जन्म एवं नंदोत्सव का वर्णन
रायपुरिया@राजेश राठौड़
खेड़ापति हनुमान सरकार के सानिध्य में चल रही भागवत सप्ताह के चौथे दिन राम अवतार की कथा सुनाते हुए साध्वी श्री सुगूना बाईसा ने कहा कौशल्या ने राम को जन्म दिया, लेकिन कैकेयी ने उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाया। कैकेयी द्वारा मांगे गए 14 वर्ष के वनवास के कारण ही राम राजमहल के सुख त्यागकर जंगल गए, जहाँ उन्होंने दुष्टों का संहार किया और आदर्श चरित्र (मर्यादा) स्थापित कर मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम बने।
रामावतार में यदि कैकेयी वनवास न मांगतीं, तो राम एक सामान्य राजा की तरह अयोध्या में रहते। वनवास ने ही राम को आम जनमानस से जोड़ा और उनत्याग को सर्वोच्च बनाया। श्री राम अपना आदर्श प्रस्तुत करते हुए कैकेयी के वचनों का सम्मान किया और सहर्ष वनवास स्वीकार किया, जो मर्यादा का प्रतीक है। इस कथा से ये निषर्क निकलता है कि कौशल्या ने शरीर रूपी राम दिया, जबकि कैकेयी ने अपने कठोर निर्णय से चरित्र रूपी मर्यादा पुरुषोत्तम राम को गढ़ा।
कथा में गिद्धराज जटायु की नि:स्वार्थ भक्ति, साहस और शरणागति का सर्वोच्च उदाहरण बताया। उन्होंने माता सीता को रावण से बचाने के लिए वृद्ध अवस्था में भी अदम्य साहस दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान श्रीराम की गोद और मोक्ष प्राप्त हुआ।
उन्होंने कहा जब रावण माता सीता का हरण कर ले जा रहा था, तब जटायु ने निर्भय होकर रावण को चुनौती दी और उसे “रे रे दुष्ट” कहकर ललकारा। वृद्ध जटायु ने रावण के साथ भीषण युद्ध किया। रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंख काट दिए, जिससे वे घायल होकर भूमि पर गिर पड़े, लेकिन उन्होंने सीता माता की रक्षा का प्रयास अंत तक जारी रखा। और श्री राम की काज में अपने प्राणों की परवाह न करते हुए बलिदान दे दिया। जटायु की निस्वार्थ भक्तिसाहस और बलिदान के देखकर भगवान राम ने जटायु को गले लगाया और उन्हें अपना परम भक्त मानकर स्वयं अंतिम संस्कार किया। जटायु को वह स्थान मिला जो राजा दशरथ को भी नहीं मिल पाया। और भगवान की गोद में प्राण त्याग कर मोक्ष दिया।
कथा को आगे बड़ते हुए सुगुणा बाईसा ने वामन अवतार, श्रीकृष्ण जन्म की कथा एवं नंदोत्सव का वर्णन किया गया। कथा के चौथे दिन आरती का प्रमुख जजमान जगदीश पटेल परिवार द्वारा उतरी गई।, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में उमा मौजूद थी। इससे पहले भागवत व्यास का पूजन पंडित सुनील शर्मा के द्वारा मंत्रोच्चारण से करवाया गया। श्रीकृष्ण जन्म की कथा का वर्णन करते हुए साध्वी जी ने बताया कि कंस की कारागार में वासुदेव- देवकी के भादो मास की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उनका लालन-पालन नंदबाबा के घर में हुआ था। इसलिए नंदगांव में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया गया। श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध करके पृथ्वी को अत्याचार से मुक्त किया और अपने माता-पिता को कारागार से छुड़वाया। कृष्ण जन्म की खुशी में शुक्रवार को कथा स्थल को विशेष रूप से सजाकर माखन मिश्री का प्रसाद वितरण किया गया तथा भक्तों ने नाच कूदकर नंदोत्सव मनाया।
इससे पहले साध्वी जी ने नानी बाई का मायरा की कथा में भक्त नरसी मेहता द्वारा भगवान कृष्ण से मायरा (भात) भरने की मार्मिक प्रार्थना सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो जाते हैं और उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। साध्वी जी कहती है कि नरसिंह जी की भक्ति निस्वार्थ भक्ति की पराकाष्ठा है, जिसमें भगवान स्वयं नानी बाई की लाज रखने के लिए प्रकट होते हैं।
नानी बाई का मायरा कथा का भावनात्मक प्रसंग सुनते हुए साध्वी ने कहा जब नरसी जी के पास देने के लिए कुछ नहीं होता और ससुराल वाले उपहास करते हैं, तब भगवान का मायरा भरना श्रद्धालुओं को भावुक कर देता है।
नरसी जी की भक्ति और विश्वास और भक्त की अटूट आस्था को देखकर पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर होकर अश्रुधारा बहाते हैं और ‘सांवरिया’ के जयकार लगाते। भगवान सवारियां सेठ 56 करोड़ का मायरा भरने के दृश्य का वर्णन सुनकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इस अवसर पर पेटलावद से कमला बुआ, रायपुरिया सारंगी, जामली, बनी रामनगर, रामगढ़ टांडा आदि ग्रामों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु कथा श्रमण करने के लिए पहुंच रहे है।




