झाबुआ में आधार बना आम आदमी की मुसीबत : सुबह 4 बजे से लगती कतारें, दिनभर की मशक्कत के बाद भी नहीं मिलती सेवा..!

Jhabuahulchul
झाबुआ से विशेष रिपोर्ट@हरीश यादव ✍🏻
झाबुआ जिले की आम जनता इन दिनों आधार से जुड़ी सेवाओं के लिए बुरी तरह से परेशान है। आधार पंजीकरण और अद्यतन (अपडेशन) जैसे जरूरी कार्यों को कराने के लिए लोगों को तड़के सुबह उठकर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। हालात इतने गंभीर हैं कि लोग अपनी जगह पक्की करने के लिए चप्पलें, पत्थर या कोई दूसरा सामान लाइन में रखकर नंबर सुरक्षित करते हैं। बावजूद इसके, ज्यादातर लोगों को शाम तक खाली हाथ लौटना पड़ता है।
जिला प्रशासन की अनदेखी, सिस्टम की खामियां और जनता की लाचारी :
झाबुआ जिले में कुल जनसंख्या के अनुपात में आधार केंद्रों की संख्या अत्यंत सीमित है। ग्रामीण अंचलों में यह स्थिति और भी विकट है। अधिकांश केंद्रों पर केवल एक या दो ऑपरेटर कार्यरत हैं, और वह भी कई बार प्रशिक्षित नहीं होते। कई केंद्रों में तकनीकी खराबी, इंटरनेट की धीमी गति, या बायोमेट्रिक डिवाइस की खराबी के कारण काम रुक जाता है।

प्रतिदिन एक केंद्र पर केवल 25 से 30 लोगों को ही सेवा मिल पाती है, जबकि जरूरतमंदों की संख्या सैकड़ों में होती है। इसका नतीजा यह होता है कि बहुत से लोगों को बार-बार आना पड़ता है, जिससे समय, पैसा और ऊर्जा तीनों की बर्बादी होती है।
ग्रामीणों की जुबानी :
ग्राम पंचायत बाखर के रहने वाले रमेश भूरिया बताते हैं :
“मैं तीन दिन से रोज सुबह 4 बजे पहुंचता हूं, लेकिन अब तक नंबर नहीं आया। आज भी 29वें नंबर पर था, लेकिन टोकन वहीं खत्म हो गए। अब फिर से कल आना पड़ेगा।”
झीरी गाँव की महिला, सावित्री बाई कहती हैं बच्चे की स्कॉलरशिप के लिए आधार अपडेशन ज़रूरी है। पर इतने दिन से चक्कर लगा रहे हैं। रोज़ खेत का काम छोड़ना पड़ता है।

विभागों के टकराव और जवाबदेही की कमी :
झाबुआ जिले में आधार सेवा संचालन की ज़िम्मेदारी अलग-अलग विभागों के पास है : जैसे बैंक शाखाएं, डाकघर, लोक सेवा केंद्र, ई-गवर्नेंस सेंटर और शिक्षा विभाग। परंतु हर विभाग का अलग नोडल अधिकारी और शिकायत प्रणाली है। इस कारण शिकायतों का समाधान मुश्किल हो जाता है।
एक ही समस्या को लेकर कोई व्यक्ति अगर बैंक में शिकायत करता है, तो उसे डाकघर भेजा जाता है। डाकघर से फिर लोक सेवा केंद्र का पता दे दिया जाता है। इस तरह एक आम नागरिक शिकायतों के ‘पिंग-पोंग’ में उलझा रह जाता है।

राजनीतिक हस्तक्षेप भी बेअसर :
आधार व्यवस्था की इस बदहाली को देखते हुए भाजपा के जिला अध्यक्ष भानु भूरिया ने हाल ही में कुछ आधार केंद्रों का निरीक्षण किया और संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलबी की।
इसी विषय को लेकर आम आदमी पार्टी के ज़िला संयोजक कमलेश सिंगाड़ ने भी कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और सुधार की मांग की।
लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है। शासन-प्रशासन के बीच समन्वय की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नागरिक सुविधाओं की उपेक्षा की वजह से लोग आज भी दर-दर भटक रहे हैं।
प्रभावित वर्ग : छात्र, वृद्धजन, किसान, और श्रमिक
छात्रों को छात्रवृत्ति, प्रवेश और बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए आधार अनिवार्य है।
वरिष्ठ नागरिकों को पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आधार जरूरी है।
किसान किसान सम्मान निधि और अन्य योजनाओं के लिए आधार अपडेट करवाने को मजबूर हैं।
मजदूर वर्ग को श्रमिक पंजीयन, बीमा और सब्सिडी योजनाओं में आधार की आवश्यकता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या केवल तकनीकी या व्यवस्थागत नहीं, बल्कि जनजीवन पर सीधा प्रभाव डालने वाला मुद्दा बन चुकी है।
क्या हैं संभावित समाधान ?
विशेषज्ञों और समाजसेवियों के अनुसार, निम्नलिखित कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए :
1. अस्थायी आधार शिविरों की संख्या बढ़ाई जाए – खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
2. प्रशिक्षित ऑपरेटरों की नियुक्ति और मौजूदा स्टाफ को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए।
3. सभी आधार केंद्रों का एकीकृत ऑनलाइन टोकन सिस्टम विकसित किया जाए।
4. शिकायतों की एकल खिड़की व्यवस्था लागू हो – जिससे विभागों के बीच तालमेल हो सके।
5. साप्ताहिक निरीक्षण और रिव्यू सिस्टम तैयार किया जाए।
झाबुआ जिले की आधार समस्या केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर चोट है। ऐसे समय में जब डिजिटल इंडिया और जन कल्याणकारी योजनाओं की बातें हो रही हैं, झाबुआ जैसे आदिवासी बहुल जिले में आधार जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव चिंता का विषय है।
सरकार और प्रशासन को अब केवल ‘जांच’ या ‘ज्ञापन’ से आगे बढ़कर कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा यह समस्या न केवल तकनीकी व्यवस्था को बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे को भी सवालों के घेरे में ला देगी।




