मोक्ष पुरुषार्थ से राग-द्वेष का अंत: महासती प्रज्ञा जी का धर्मसभा में संदेश…!

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झाबुआ@हरीश यादव
रुनवाल बाजार स्थित महावीर भवन में वर्षावास के अवसर पर आयोजित धर्मसभा में पूज्या महासती प्रज्ञा जी महाराज साहब ने कहा कि मोक्ष पुरुषार्थ से राग और द्वेष का पूर्ण नाश होता है, जिससे जीव को परम शांति की प्राप्ति होती है।
महासती जी ने पुरुषार्थ के चार प्रकार बताते हुए कहा कि आचार्य भगवंत पूज्य उमेश मुनि जी महाराज साहब द्वारा रचित ‘मोक्ष पुरुषार्थ’ पुस्तक में पुरुषार्थ को चार भागों में विभाजित किया गया है :
धर्म पुरुषार्थ, अर्थ पुरुषार्थ, काम पुरुषार्थ, मोक्ष पुरुषार्थ
धर्म पुरुषार्थ
धर्म पुरुषार्थ में लोकमंगल के कार्य करना, दान देना, शिक्षण में सहयोग देना, स्वास्थ्य सेवा और पुण्य कार्य करना शामिल है।
अर्थ पुरुषार्थ
अर्थ पुरुषार्थ धन-संपत्ति अर्जन से जुड़ा है। महासती जी ने कहा कि जीवन-यापन के लिए धन आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक लोभ अनर्थ का कारण बनता है। कभी-कभी धन के मोह में लोग अनैतिक कार्य तक कर देते हैं।
काम पुरुषार्थ
काम पुरुषार्थ इंद्रियों की विषय-वासनाओं से संबंधित है। यह शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श के भोग में प्रकट होता है।
मोक्ष पुरुषार्थ
मोक्ष पुरुषार्थ से राग-द्वेष समाप्त होता है, सभी विकारी भाव और कर्म नष्ट हो जाते हैं। यही आत्मा की अंतिम मंजिल है।
संयमी आत्मा और परिषह सहन
साध्वी पूर्णता जी ने धर्मसभा में कहा कि प्रभु महावीर स्वामी जी ने अंतिम समय में तीन दिन तक उत्तराध्ययन सूत्र की देशना दी थी, जिसमें संयमी आत्माओं का वर्णन किया गया है। उन्होंने बताया कि संयमी आत्माओं को 22 प्रकार के परिषह आते हैं, जिन्हें वे समभाव से सहन करते हैं।
परिषह सहन करने से कर्मों की निर्जरा होती है और नए कर्मों का बंध नहीं होता। धैर्यपूर्वक इन कठिनाइयों को सहन करना संयमी का प्रमुख गुण है।
उन्होंने बताया कि ज्ञानावरणीय कर्म, अन्तराय कर्म, वेदनीय कर्म और मोहनीय कर्म के उदय से परिषह आते हैं, लेकिन संयमी आत्मा इन्हें सहन कर प्रसन्न रहती है।
तपस्या और उपवास
तपस्या के क्रम में अर्हम घोड़ावत और लव कटारिया ने महासती प्रज्ञा जी के सानिध्य में 10 उपवास के प्रत्याख्यान लिए।