सूचना अधिकार अधिनियम का उल्लंघन,,आखिर क्यों छुपा रहे हैं जानकारी..?..जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग का मामला..!

#Jhabuahulchul
मेघनगर@मुकेश सोलंकी
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा लगातार सूचना अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करते हुए आवेदनकर्ता को गुमराह किया जाने का मामला प्रकाश में आया है।
मामला मेघनगर के आरटीआई कार्यकर्ता मुकेश सोलंकी निवासी मेघनगर द्वारा लगभग 1 वर्ष पूर्व सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दिए गए आवेदन से शुरू हुआ, आवेदन प्रस्तुत करने के बाद में विभाग द्वारा आवेदक से सूचना देने के नाम पर भारी भरकम राशि की मांग कर ली गई जब आवेदक ने महसूस किया कि जानकारी इतने अधिक पृष्ठ की नहीं हो सकती है अतः उन्होंने जानकारी का निर्धारित शुल्क देकर अवलोकन किया, अवलोकन पश्चात् आवेदक ने जो जानकारी चाहि थी उसकी राशि मात्र रु 265/- ही निकली, आवेदक मुकेश सोलंकी द्वारा राशि जमा कर पत्र के माध्यम से जानकारी शीघ्र उपलब्ध करवाने का निवेदन किया किंतु मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा कभी स्टाफ की कमी तो कभी फोटोकॉपी नहीं हो पाने का बहाना बनाकर टालम टोल किया जाता रहा निर्धारित समय सीमा में जानकारी प्राप्त नहीं होने पर आवेदक द्वारा नियम अनुसार प्रथम अपिलीय अधिकारी के बारे में पूछने पर भी गुमराह करते हुए कहा गया कि आपको लिखित में सूचना दे देंगे, इस प्रकार लगातार सूचना का अधिकार अधिनियम से खेलते रहे। कई माह पश्चात जानकारी उपलब्ध करवाई गई लेकिन अधूरी, शेष जानकारी के लिए आवेदक पुनः जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के चक्कर लगाते रहे किंतु हर बार उन्हें कोई नया बहाना बनाकर टाल दिया जाता रहा है, किसी प्रकार आवेदक द्वारा प्रथम अपिलिय अधिकारी का पता लगाकर अपील की गई जहां पर अपील की नियत तिथि को स्वास्थ्य विभाग से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ, इससे सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रति स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही नजर आती है।
क्षेत्रीय संचालक के आदेश की अवहेलना
अपिल में निराकरण करते हुए क्षेत्रीय संचालक इंदौर द्वारा आवेदक को तीन दिवस के भीतर जानकारी उपलब्ध करवाने का आदेश किया गया था लेकिन वह आदेश भी जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने हवा में उड़ाते हुए जानकारि छुपा रखी है।
क्या दाल में कुछ काला है ???
आखिर क्या कारण है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस प्रकार से शासकीय निविदा संबंधी जानकारी छुपाई जा रही है ? क्या निविदा में कुछ ऐसा हुआ है जो नियमों के विपरीत हुआ हो ? कहीं ऐसा तो नहीं की किसी एक निविदाकर्ता को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नियमों को ताक पर रख दिया गया हो..? कही इसमें शासकीय राशि का दुरुपयोग नहीं हो रहा है..?
सवाल तो बहुत सारे हैं मगर फिलहाल जवाब कुछ नहीं
बार-बार फोन मत लगाया करो….
आवेदक द्वारा शेष जानकारी के संबंध में फोन लगाकर जानना चाहा तो जिला एवं चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा कहा गया कि बार-बार फोन मत लगाया करो जानकारी दे देंगे , इस प्रकार से फोन कॉल पर जवाब देने से पता चलता है कि साहब आम नागरिक के प्रति अपनी जवाबदेही से भी पल्ला झाड़ रहें है।




