रायपुरिया

धुलेटी पर गल देवता की परिक्रमा से उतरेगी मन्नत, सात दिन की कठोर साधना के बाद नवापाड़ा के श्रद्धालु निभा रहे परंपरा…

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रायपुरिया@राजेश राठौड़

अंचल में होली और भगोरिया पर्व के साथ आस्था और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। धुलेटी के दिन नवापाड़ा के मन्नतधारी श्रद्धालु गल देवता की परिक्रमा कर अपनी वर्षों पुरानी मन्नत उतारेंगे। परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और संकट निवारण की कामना लेकर ली गई यह मन्नत अब श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है।

नवापाड़ा निवासी भेरूलाल निनामा, धन्ना निनामा और नाथु निनामा ने बताया कि जब परिवार पर संकट आता है तो वे गल देवता से मन्नत मांगते हैं। उनका कहना है कि “गल देवता हमारी हर मनोकामना पूर्ण करते हैं और परिवार की रक्षा करते हैं।” भेरूलाल निनामा ने बताया कि उन्होंने पांच वर्ष पूर्व मन्नत मांगी थी, जो पहले ही वर्ष पूर्ण हो गई। यह उनका तीसरा वर्ष है जब वे परंपरा अनुसार गल में घूमकर मन्नत उतार रहे हैं।

सात दिन की कठोर साधना

मन्नतधारी होली पर्व के सात दिन पहले से विशेष नियमों का पालन शुरू कर देते हैं। वे अपने शरीर पर हल्दी लगाते हैं, लाल वस्त्र धारण करते हैं, माथे पर पगड़ी बांधते हैं और हाथों में नारियल व कांच का कड़ा रखते हैं। आंखों में काजल लगाकर वे सातों दिन ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।

इन सात दिनों में वे घर के बाहर सोते हैं, अपने हाथों से भोजन बनाते हैं और दिन में केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करते हैं। पूरे समय नंगे पैर रहकर अंचल के विभिन्न गांवों में लगने वाले भगोरिया हाट बाजारों में पहुंचते हैं और लोगों से मेल-मिलाप करते हुए आशीर्वाद लेते हैं। यह तपस्या और अनुशासन श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को दर्शाता है।

आस्था का केंद्र है गल देवता

अंचल में गल देवता के प्रति गहरी श्रद्धा है। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत अवश्य पूर्ण होती है। धुलेटी के दिन श्रद्धालु विधि-विधान से गल देवता की परिक्रमा कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।

ग्रामीणों का मानना है कि जहां आस्था और विश्वास होता है, वहां ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहती है। यही कारण है कि हर वर्ष अनेक श्रद्धालु कठिन नियमों का पालन करते हुए इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं। धुलेटी के अवसर पर होने वाली यह विशेष परिक्रमा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि अंचल की सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं को भी सहेजने का माध्यम बन गई है।

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